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Showing posts from February, 2022

खाड़िया में लिपा वो गाँव - भाग 1

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वो छोटा सा घर, चौपाल के सामने संकरी गली, खुली बेतरतीब नालियाँ दस कदम दूरी पर सरकारी नलका नलके के हत्थे के छोर का स्वाद और उसका रंग.... किनारे से घिसा हुआ कितने सारे घरों के बीच में था वो....  कई बार तो उसी के तने पर बाँधकर गाँव वाले अपनी भैंसे भी नेहला लिया करते छत की मुंडएर पर नीम की टेहनियों का छूना, बढ़ना और वहीं छत से नीचे सपेरे को अपना खेल दिखाते देखना गाँव की दोपहर में कहानी वाली चुड़ैल से डरना, जो बच्चे उठा ले जाती शायद डर की नीव वहीं डली दीवार के आले में सेंजी लगाना वो दुकड़ियाँ में बिछा तखत वहीं बैठकर दरवाज़े के बाहर चौपाल पर घटती बड़ती भीड़ देखना पड़ोस की वो तुतलाती 'डॉली' शायद मेरी सबसे पहली सहेली, उसका वो अतरंगी बड़ा भाई फूल गोभी के कीड़े खाने की शर्त लगाता वो दादा की उम्र का 'रतिया' जिसे बच्चे बूढ़े सब नाम से बुलाते बताते हैं परदादा के भाई उसे कहीं दूर दराज़ से उठाकर ले आये घर के ठीक पीछे वो भूरी आँखों वाली चंचल चाची और उनके दो अव्वल शैतान लड़के  घर के बायीं ओर 'कटार बाबा' की महकती दुकान  उनकी कंजूसी और बेअतबि किस्सों में मशूर थी और इन्ही किस्सों की

बे- ईमान

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ईमान से कहुँ ?  या रहने दूँ उसे ?  ईमान भी तो सुस्त है, शाँत कहीं, छुपा रहना चाहता है आज थक गया है जिंदा रहना, चलते रहना....  इन सब में ईमान का सीला चेहरा अपनों में अकेला ईमान रोज़मर्रा की छोटी छोटी लड़ाइयों में खुदको सिकोड़ता ईमान ईमान है भी या नही...?... या उसे याद करना था बस...?  शायद चल बसा कि एक बार फिर... जो है नहीं, उसका ईमान जहाँ सबसे गहरा है, जिसके नीचे कुछ नहीं  उसी की तलाश में..  For a SEHAJ Conversation and  to share your unique opinions, Please visit our YouTube Channel Unmukt Anu  😊

That Guiding Light

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 On a beautiful damp winter evening, a teenager boy is playing marbles in the courtyard, in front of a military lane. Neither interested, nor good in the game he is rather inclined towards the shape and the color sequences forming the tiny marbles. One of the onlooker senior citizens while observing, smiled and softly said  'these marbles remind me of the universe and the life emerging out of it.'                                         Hearing this the boy was filled with curiosity and his eyes were lit up with innocent eagerness. He left the game and followed the old man until the mall road. Old man noticed this naïve childhood chasing him. He asked 'Sweet boy, may I ask the reason of this chase?" .....                Hesitantly, the boy says 'I want to ask you something....may I?' Old man nods in affirmation. Boy continues 'what is universe? what is life?".....Hearing this, the old man paused for a bit as the shrinking wrinkles of his forehead felt

A Narrow Crack

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Truth is Simple

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Staying true to what we are seems easy but sometimes nothing else is as tough as just being a sincere reflection of our conscience. But how do we do that? And what do we achieve by being truthful?           Truth lies somewhere around us, unknown to our understanding, dangling between varied interpretations of humankind, silently expanding in the subtleness of an atom and rising like a golden ray in the cosmos. I wish to sympathize with the daily struggle of cosmic energy or the universal intelligence that's guiding our life..... Afterall, this energy, that is beyond our understanding is tirelessly, without a break is keeping the wheel of time churning. So, here's to life and the energies of the cosmos. Gratitude :)  For a SEHAJ Conversation and  to share your unique opinions, Please visit our YouTube Channel Unmukt Anu  😊

एहसास- ए- जिंदगी

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बहक जाना कितना आसान है खुद से दूर हो जाना इतना की दूरी का एहसास ही ना रहे बहक गए हैं, पता ही ना चले मौसम सर्द है, तो धूप की सेक में गर्म है, तो पेड़ों की छाओं में  या मीं की बूँदें या सिर्फ मचलती हवा और इसकी छुअन से थिरकती पेड़ों की पत्तियाँ पड़ोस में पसरी जन आबादी  मुंढेरों पर बैठे इक्ले दुक्ले कबूतर नीला अम्बर भूरा ततैया कुछ वक्त इनके पास, इनके लिए ये श्रृष्टि का अंश हैं.... या यहीं हैं इसी उलझन में बहकना कहीं बहक जाता है  फिर से सब आसान सा लगता है जिंदगी एहसास ही तो है बस  For a SEHAJ Conversation and  to share your unique opinions, Please visit our YouTube Channel Unmukt Anu  😊

संवाद

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संवाद.. मन में सुगंध जैसा बिखरा हुआ ओझल, अनछुआ सा संवाद, लोगों के बीच, जो है भी..... नहीं भी संवाद का ना कोई सार है, ना किनारा कोई ज़मीन भी नहीं, कहाँ टिका है संवाद?  जीवन पग पग बढ़ रहा है.... या घट रहा है?  उलझनों में बरस रहा है संवाद निरर्थक, बेचैन सा बिन पेंदे के लोटे की तरह संवाद मेरा है या किसी और का?  ये मंन स्थिति समझ नहीं पाता खामोशी में चीखता है संवाद....  फँसा है कहीँ ज़मीन की सिलवटों में, या अम्बर की परतों में?  या फिर बस झूल रहा है, समय की तलहटी पर संवाद सबके साथ भी है और अकेला भी काला भी, सफ़ेद भी...... गहरा और सतही रंग भी दिखते हैं कभी कभी कभी मंद पड़ जाता है संवाद.... इस छोर से.........................  ..............ना जाने कहाँ तक...  For a SEHAJ Conversation and  to share your unique opinions, Please visit our YouTube Channel Unmukt Anu  😊